समानता का अधिकार (Right to Equality): अनुच्छेद 14 से 18 की विस्तृत व्याख्या

 भारतीय संविधान की आत्मा इसके मौलिक अधिकारों के बसती है। यदि हम लोकतंत्र की बात करते है, तो 'समानता' उसका आधार स्तंभ है। politypulse.in के आज के इस विशेष लेख में हम भारतीय संविधान के भाग 3 के निहित समानता के अधिकार (Right to Equality) पर चर्चा करेंगे, जो अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक फैला हुआ है। 

समानता का अधिकार (Right to Equality): अनुच्छेद 14 से 18 की विस्तृत व्याख्या

समानता का अधिकार क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 तक मौलिक अधिकारों का वर्णन है। इसमें सबसे पहला और महत्वपूर्ण अधिकार 'समानता का अधिकार' है। यह अधिकार सुनिश्चित करता है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ विशेषाधिकार के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा और समाज के प्रत्येक वर्ग की उन्नति के समान अवसर मिलेंगे। 

अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता

  • राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। 

इसमें दो मुख्य अवधारणाएं शामिल है:

  1. विधि के समक्ष समानता (Equality before Law): यह ब्रिटिश अवधारणा है। इसका अर्थ है कि कानून की नज़र में सब बराबर है, चाहे कोई साधारण नागरिक हो या कोई बड़ा अधिकारी। इसके तहत व्यक्ति के साथ वंश, जाति, लिंग, धर्म अन्य आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। सभी लोग कानून की नज़र में बराबर है। यह एक नकारात्मक अवधारणा है, जो किसी भी वर्ग या व्यक्ति को विशेष प्रावधान देने से रोकती है। 
  2. विधियों का समान संरक्षण (Equal Protection of Laws): यह अमेरिकी संविधान से प्रेरित है। इसका अर्थ है कि किसी समान परिस्थितियों वाले लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। हर व्यक्ति के साथ समान व्यवहार नहीं बल्कि न्यायसंगत व्यवहार होगा। अर्थात् अलग अलग परिस्थितियों में अलग अलग कानून लागू हो सकते है। यह सकारात्मक अवधारणा है, हो ज़रूरतमंद या पिछड़े लोगों को अतिरिक्त संरक्षण प्रदान करती है। जैसे अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति, महिलाओं, बच्चों के लिए विशेष प्रावधान या आरक्षण देना शामिल है। 

अनुच्छेद 15: भेदभाव का निषेध 

  • अनुच्छेद 15(1) राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करेगा। 
  • अनुच्छेद 15(2) कोई नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी आधार पर सार्वजनिक स्थानों (दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों) के उपयोग से किसी को नहीं रोका जाएगा। 
  • अनुच्छेद 15(3) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान के किये जाने का प्रावधान है। 
  • अनुच्छेद 15(4) और 15(5) राज्य सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग जैसे अनुसूचित जनजाति अनुसूचित जाति (पहला संविधान संशोधन अधिनियम, 1951)और अन्य पिछड़ा वर्ग (93वां संविधान संशोधन अधिनियम 2005) लिए कोई विशेष प्रावधान करने से इस अनुच्छेद के कोई प्रावधान राज्य को निवारित (रोक नहीं सकते) नहीं करेंगे। अनुच्छेद 15(6) राज्य आर्थिक रूप से पिछड़े (EWS) वर्ग के लिए विशेष उपबंध कर सकता है (103 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2019) 

अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता 

  • राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी। राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा। 
  • सरकारी नौकरियों (Public Employment) में सभी नागरिकों को समान अवसर मिले, यह अनुच्छेद 16 सुनिश्चित करता है। 
  • राज्य के पास यह शक्ति है कि वह पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के लिए, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की सेवाओं के प्रयाप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण (Reservation) का प्रावधान कर सकता है। 

अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत 

  • भारतीय समाज के व्याप्त छुआछूत जैसी कुरीतियों को जड़ से खत्म करने के लिए अनुच्छेद 17 को शामिल किया गया। 
  • यह अनुच्छेद अस्पृश्यता को समाप्त करता है और किसी भी रूप में इसका आचरण निषिद्ध करता है। 
  • अस्पृश्यता से उपजी किसी भी अक्षमता को लागू करना एक दंडनीय अपराध है। इसके लिए संसद ने अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 बनाया था, जिसे बाद में 'नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम' नाम दिया गया। 

अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत 

  • समानता को बनाए रखने के लिए यह जरूरी था, की औपनिवेशिक काल की राय बहादुर, महाराजा जैसी उपाधियों को खत्म किया जाए। 
  • सैन्य और शैक्षणिक विशिष्टताओं को छोड़कर राज्य कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा। 
  • भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। 
  • भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री पुरस्कार है, उपाधियाँ नहीं। इन्हें नाम के आगे या पीछे प्रत्यय या उपसर्ग के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। 
  • समानता के अधिकार का महत्व
  • समानता का अधिकार भारतीय लोकतंत्र की नींव है। इसके बिना स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19-22) का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यह अधिकार: कानून का शासन (Rule of Law) स्थापित करता है। समाज के वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाता है। व्यक्तिगत गरिमा को बढ़ावा देता है। विविधतापूर्ण भारत में एकता बनाए रखने के मदद करता है। 

निष्कर्ष 

इस प्रकार, समानता का अधिकार केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक के प्रावधान यह सुनिश्चित करते है कि राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ मनमाना, पक्षपातपूर्ण या भेदभावपूर्ण व्यवहार न करे और हर नागरिक को सम्मानपूर्ण जीवन जीने का अवसर मिले। कानून के समक्ष समानता हमें समान दर्जा देती है, जबकि समान संरक्षण का सिद्धांत वास्तविक सामाजिक आर्थिक विषमताओं को कम करने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाने की अनुमति देता है। 

संविधान निर्माताओं का उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जहाँ कोई भी व्यक्ति जन्म या स्थिति के आधार पर श्रेष्ठ न हो। politypulse.in का यह लेख स्पष्ट करता है कि अनुच्छेद 14 से 18 केवल कानूनी शब्द नहीं है, बल्कि एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के औजार है। 

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