भारत के कानूनी इतिहास में कुछ फैसले ऐसे भी होते हैं जो न केवल कानून की दिशा बदलते हैं, बल्कि इंसान के जीने और मरने के नजरिये को भी नया आयाम देते है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को दी गई मान्यता ऐसा ही एक क्रांतिकारी कदम है। इस लेख में हम हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक मामले "हरीश राणा बनाम भारत संघ, 2026" का विस्तार से अध्ययन करेंगे, और इच्छा मृत्यु के विभिन्न पहलुओं को समझेंगे। साथ ही लिविंग विल और इच्छा मृत्यु का अनुच्छेद 21 से संबंध भी जानेंगे।
इच्छा मृत्यु (Euthanasia) क्या है?
सरल शब्दों में कहें तो इच्छा मृत्यु का अर्थ है किसी इंसान को असहनीय पीड़ा या लाइलाज़ बीमारी की स्थिति में उसके कष्ट को समाप्त करने के लिए मृत्यु की अनुमति देना। यह दो प्रकार की होती है:
सक्रिय इच्छा मृत्यु (Active Euthanasia): इसमें डॉक्टर मरीज़ को कोई घातक इंजेक्शन या दवा देकर मृत्यु की प्रक्रिया को तेज कर देते है। भारत के यह अवैध है, किंतु कुछ पश्चिमी देशों में यह वैध है।
निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia): इसमें मरीज को जीवित रखने वाले लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को हटा लिया जाता है ताकि प्रकृति अपना काम कर सके। सुप्रीम कोर्ट ने इसे शर्तों के साथ अनुमति दी है।
अरुणा रामचंद्र शानबाग बनाम भारत संघ 2011
भारत में इच्छा मृत्यु की बहस अरुणा शानबाग के मामले से शुरू हुई। अरुणा केईएम अस्पताल, मुंबई में एक नर्स थी, जिनके साथ 1973 में यौन हमला हुआ था। इस हमले के कारण वह 42 वर्षों तक परमानेंट वेजिटेटिव स्टेज (PVS) में रही।
उनकी मित्र और लेखिका पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अरुणा को इस कष्टकारी जीवन से मुक्ति दिलाने की मांग की थी। 2011 में इस केस में कोर्ट ने पहली बार माना कि निष्क्रीय इच्छा मृत्यु की अनुमति कुछ विशेष परिस्थितियों में दी जा सकती है। हालांकि, अरुणा को इसकी अनुमति नहीं मिली क्योंकि अस्पताल की नर्सों ने उनकी देखभाल करना जारी रखने की इच्छा जताई थी।
कॉमन कॉज बनाम भारत संघ 2018
इच्छा मृत्यु की अगली कड़ी सुप्रीम कोर्ट के ही एक और फैसले से जुड़ी है, जो 9 मार्च 2018 को आया, जब न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
अनुच्छेद 21 का विस्तार: कोर्ट ने कहा कि संविधान द्वारा दिए गए जीवन का अधिकार में गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी शामिल है। केवल सांस लेना जीवन नहीं होता है, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीना और मारना भी जीवन का आधार है।
लिविंग विल (Living Will): सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल या एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव को कानूनी मान्यता दी। इसके तहत कोई भी स्वस्थ व्यक्ति पहले से यह लिख कर दे सकता है कि अगर भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुँच जाए जहाँ उसका ठीक होना नामुमकिन हो, तो उसे लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए।
दिशा निर्देश और प्रक्रिया (Guidelines)
- सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था के दुरुप्रयोग रोकने के लिए सख्त नियम बनाए है:
- मेडिकल बोर्ड का गठन: अस्पताल को एक मेडिकल बोर्ड बनाना होगा जो मरीज की स्थिति की जांच करेगा।
- जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका: अस्पताल को जिला स्तर के मेडिकल बोर्ड से पुष्टि करनी होगी।
- मरीज की सहमति: यदि मरीज होश में नहीं है, तो उसके परिजन या नेक्स्ट फ्रेंड की सहमति और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर फैसला लिया जाएगा।
इस फैसले का महत्व और चुनौतियाँ
- सकारात्मक पक्ष:
- यह फैसला उन मरीजों के लिए वरदान है जो सालों से बिना किसी उम्मीद के मशीनों के सहारे जी रहे है।
- यह परिवारों को भावनात्मक और आर्थिक बोझ से राहत देता है।
- यह व्यक्ति की अपनी स्वायत्तता (Autonomy) का सम्मान करता है।
- चुनौतियां
- दुरुपयोग का डर: डर है कि संपत्ति या अन्य लालच में परिवार के लोग इसका गलत इस्तेमाल न करें।
- धार्मिक और नैतिक बहस: कई लोग इसे ईश्वर के काम में दखल मानते है।
- स्पष्ट कानून का अभाव: अभी भी संसद द्वारा इस पर कोई विस्तृत कानून बनाना बाकी है; वर्तमान में केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश ही प्रभावी है।
हरीश राणा बनाम भारत संघ, 2026
भारत में इच्छा मृत्यु का विषय एक बार फिर उठा है, जब मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को सीधे तौर पर निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) के आवेदन को मंजूरी देते हुए जीवन रक्षण प्रणाली हटाने का आदेश दिया है। यह मामला भारत के कानूनी इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ है। यह देश का पहला ऐसा मामला है, जहां निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को मंजूरी मिली है।
इस मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हरीश राणा (2013) चंडीगढ़ में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर जाने के कारण वे परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में चले गए। पिछले 13 वर्षों से वे बिस्तर पर थे, पूरी तरह से लकवाग्रस्त (Quadriplegia) थे और ट्यूब के माध्यम से दिये जाने वाले पोषण (CANH) पर जीवित थे। उनके माता पिता ने उनके निरंतर कष्ट और वित्तीय तंगी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट से उन्हें गरिमापूर्ण मृत्यु देने की गुहार लगाई थी।
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला: मार्च 2026 में न्यायमूर्ति JB पादरीवाला और न्यायमूर्ति KV विश्वनाथ की पीठ ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की अनुमति दी। कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु स्पष्ट किए:
- अनुच्छेद 21 का पुनर्मूल्यांकन: कोर्ट ने दोहराया कि जीने के अधिकार के गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी शामिल है। केवल सांस लेना जीवन नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ अस्तित्व का होना ज़रूरी है।
- मेडिकल बोर्ड की राय: कोर्ट ने एम्स (AIIMS) द्वारा गठित प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर फैसला लिया, जिसमें कहा गया था कि हरीश के ठीक होने की संभावना शून्य है।
- CANH एक उपचार है: कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के पिछले फैसले को पलटते हुए स्पष्ट किया कि ट्यूब से दिया जाने वाला भोजन और पानी (Clinically Assisted Nutrition and Hydration) कोई बुनियादी देखभाल नहीं बल्कि एक चिकित्सीय उपचार है, जिसे मरीज की गरिमा के लिए हटाया जा सकता है।
फैसले की मानवीय संवेदना: न्यायमूर्ति पारदीवाला ने फैसले सुनते समय भावुक होते हुए कहा: "यह निर्णय केवल तर्क पर आधारित नहीं है, बल्कि यह प्यार, चिकित्सा और विज्ञान के बीच का एक स्थान है। माता पिता अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे है, बल्कि उसे गरिमा के साथ जाने की अनुमति दे रहे है।"
प्रक्रिया और निर्देश:
- सुप्रीम कोर्ट ने दिशा निर्देश दिए कि:
- हरीश राणा को एम्स (AIIMS), दिल्ली के Palliative Care विभाग में भर्ती किया जाए।
- जीवन रक्षण प्रणालियों को धीरे धीरे और मानवीय तरीके से हटाया जाए ताकि मरीज को कोई दर्द न हो।
- अनावश्यक देरी को रोकने के लिए कोर्ट ने 30 दिनों की अनिवार्य पुनर्विचार अवधि (Cooling off period) को भी विशेष मामले में हटा दिया।
इस फैसले का महत्व (Significance)
- प्रथम व्यवहारिक अनुप्रयोग: 2018 के कॉमन कॉज फैसले (जिसमें पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता मिली थी) के बाद यह पहला मामला है जहाँ कोर्ट ने वास्तव में इसे लागू किया।
- कानूनी स्पष्टता: यह फैसला भविष्य में उन परिवारों के लिए एक मार्गदर्शक बनेगा जो अपने प्रियजनों को असहनीय पीड़ा और लाइलाज स्थिति से मुक्त करना चाहते है।
- वित्तीय और भावनात्मक बोझ का संज्ञान: कोर्ट ने स्वीकार किया कि लंबे समय तक लाइलाज़ बीमारी न केवल मरीज बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से पीड़ा देती है।
निष्कर्ष:
हरीश राणा बनाम भारत संघ, 2026 का फैसला यह संदेश देता है कि कानून को केवल सख्त नियमों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसमें करुणा और मानवीय गरिमा के लिए भी जगह होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मानवीय संवेदनाओं और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के बीच एक बेहतरीन संतुलन है। यह याद दिलाता है कि जीवन केवल सांस लेने का नाम नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीने का नाम है। यदि जीने की गरिमा समाप्त हो जाए, तो सम्मान के साथ विदा होने का अधिकार भी एक बुनियादी मानवाधिकार है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल शैक्षिक जानकारी के लिए है। कानूनी या चिकित्सा संबंधी सलाह के लिए कृपया विषेशज्ञों से संपर्क करे।
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