भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और उसका संविधान विश्व के सबसे विस्तृत लिखित संविधानों में से एक है। भारत का संविधान न तो पूर्ण रुप से संघीय (Federal) है और न ही पूर्णतः एकात्मक (Unitary)। इसे एक मिश्रित संरचना (Mixed Structure) कहते है, जिसे एक प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ KC wheare ने "Quasi-Federal" कहा है।
भारत की शासन प्रणाली में संघीय और एकत्मक दोनों तत्वों का संतुलन मिश्रण है, लेकिन इसमें एकात्मकता (Unitarism) का झुकाव अधिक दिखाई पड़ता है। इसी कारण से इसे "अर्ध संघीय लेकिन एकत्मक झुकाव" (Quasi Federal with a Unitary Tilt) कहते है।
संविधान निर्माताओं ने भारत की विशाल भौगोलिक सीमा, सांस्कृतिक विविधता, भाषाई भिन्नता और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता को मध्य में रखते हुए एक ऐसी शासन प्रणाली अपनाई जिसमें संघीय ढांचे के साथ साथ केंद्र को अपेक्षाकृत अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई।
संघीय शासन व्यवस्था क्या है?
संघीय शासन प्रणाली वह शासन व्यवस्था है जिसमें शासन की शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्यों के बीच संविधान द्वारा किया जाता है। दोनों स्तर की सरकारें अपने अपने विषयों में स्वतंत्र रूप से कानून बनाती और कानून का संचालन करती है। इस व्यवस्था की कुछ प्रमुख विशेषताएं: दो स्तर की सरकारें, शक्तियों का संवैधानिक विभाजन, एक लिखित संविधान, संविधान की सर्वोच्चता, स्वतंत्र न्यायपालिका, संविधान संशोधन की विशेष प्रक्रिया आदि।
Quasi Federal का अर्थ क्या है?
अर्ध संघीय (Quasi Federal) व्यवस्था उसे कहते है, जिसमें नहीं पूर्ण रूप से संघीय लक्षण होते है और न ही एकात्मकता के पूर्ण लक्षण होते है, जिसमें इन दोनों का मिला जुला रूप दिखाई पड़ता है। इस व्यवस्था में केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों को शक्तियाँ मिलती है। किंतु शक्तियों का झुकाव थोड़ा केंद्र सरकार की ओर अधिक होता है।
भारत के इस व्यवस्था को अपनाने के बहुत कारण थे। जैसे कि भारत की विविधता (Diversity) यह एक महत्वपूर्ण कारण है क्योंकि भारत में सभी धर्मों के लोग एक साथ रहते है भारत में अनेक भाषाएं बोली जाती है, अलग अलग संस्कृति से संबंधित लोगों को एक साथ जोड़ने के लिए एक मजबूत केंद्र का होना जरूरी था। इसी कारण से भारत के केंद्र को अधिक शक्तियाँ प्रदान की है।
एकात्मकता का अन्य कारण यह भी है कि भारत अपने प्रारंभिक दौर में विभाजन (Partition) से गुजरा था, इसी तरह का विभाजन भारत का पुनः ना हो इसी लिए संविधान निर्माताओं ने भारत को एक अर्ध संघीय राज्य जिसमें केंद्र के अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई।
भारत के संविधान के संघीय होने के उदाहरण
शक्तियों का विभाजन (Division of Powers)
संविधान में केंद्र और राज्यों की शक्तियों का विभाजन स्पष्ट रूप से किया गया है जो कि भारत के संधीय रूप को दर्शाता है। संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) में तीन सूचियाँ दी गई है: 1) संघ सूची (Union List), इस सूची में शामिल विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद के पास है। ये विषय देश हित में बहुत ही महत्वपूर्ण है जैसे सुरक्षा, संचार और अंतर्राष्ट्रीय संबंध आदि, 2) राज्य सूची (State List) इस सूची में राज्य विशेष के विषय शामिल है इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास है इसमें शामिल है राज्य पुलिस, भूमि, विवाह आदि, 3) समवर्ती सूची (Concurrent List) इस सूची में शामिल विषय पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों को होता है किंतु टकराव की स्थिति में केंद्र सरकार का कानून प्रभावी होगा।
स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)
संघीय राज्य में एक स्वतंत्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है भारत मे स्वतंत्र न्यायपालिका के साथ एकीकृत न्यायपालिका का भी गठन किया गया है जिसमें सर्वोच्च स्थान पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court), राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय (High Court) और जिला स्तर पर अधीनस्थ न्यायलय (Subordinate Court) का अस्तित्व है ये सभी न्यायालयों का तंत्र केंद्रीय कानून के साथ राज्य कानून को भी लागू कराती हैं, जबकि अमेरिका में केंद्रीय न्यायपालिका केंद्रीय कानून और राज्य न्यायपालिका राज्य के कानून को लागू कराती हैं
संघीय न्यायपालिका, संघीय अदालत है यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की गारंटी प्रदान करती है और संविधान की संरक्षक हैं
संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution)
भारतीय संविधान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution) है। इसका अर्थ है कि भारत में संविधान ही देश का सर्वोच्च कानून है और सरकार का कोई भी अंग चाहे वह संसद हो, राज्य विधानसभा हो, कार्यपालिका या न्यायपालिका हो वह भी संविधान से ऊपर नहीं है। केंद्र राज्य दोनों सरकारों को अपने सभी कार्य संविधान के प्रावधानों के अनुसार ही करते होते है।
संविधान की सर्वोच्चता यह सुनिश्चित करती है कि शासन मनमाने ढंग से न चले, बल्कि कानून और निर्धारित नियमों के अधीन रहे। संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन करता है तथा दोनों के अधिकार और सीमाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है। यदि कोई सरकार अपनी निर्धारित सीमाओं से बाहर जाकर कार्य करती है, तो उसका निर्णय का न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है।
भारत के न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की अवधारणा संविधान की सर्वोच्चता को और मजबूत बनाती है। इसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय यह जांच कर सकते है, की संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कोई कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं। यदि कोई कानून संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है।
संविधान की सर्वोच्चता नागरिकों के मौलिक अधिकारों की भी रक्षा करती है। यह सुनिश्चित करती है कि सरकार नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों का हनन न करे। इसी कारण भारत में संविधान को शासन व्यवस्था की आधारशिला माना जाता है। संविधान की सर्वोच्चता लोकतंत्र, विधि के शासन (Rule of Law) और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का मूल आधार है तथा भारतीय संघीय व्यवस्था को स्थिर और संतुलित बनाए रखने के महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
संविधान के एकात्मक झुकाव के उदाहरण
शक्तिशाली केंद्र (Powerful center)
भारत के संविधान की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें संघीय शासन व्यवस्था अपनाई है, किंतु साथ साथ इसमें केंद्र सरकार को राज्यों की तुलना में अधिक शक्तियाँ दी गई है। इसी कारण से भारतीय संघवाद को "केंद्रमुख संघवाद" (Centralized Federalism) भी कहा जाता है। संविधान निर्माताओं का मानना था कि भारत जैसे विशाल, विविध संस्कृतियों और नवस्वतंत्र देश के लिए और देश की राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत केंद्र की जरूरत है।
केंद्र को राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करने, अंतर्राज्यीय विवादों के समाधान तथा राष्ट्रीय नीतियों के क्रियान्वयन के भी महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। इन सभी प्रावधानों से स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान ने संधीय ढाँचे को बनाए रखते हुए केंद्र सरकार को अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली बनाया है, ताकि देश की एकता, अखंडता और प्रशासनिक दक्षता सुनिश्चित की जा सके।
एकल नागरिकता (Single citizenship)
भारतीय संविधान में एकल नागरिकता पर विशेष प्रावधान है। इसका अर्थ है कि भारत के प्रत्येक नागरिक की केवल एक ही नागरिकता होती है, भारत की नागरिकता। भारत किसी नागरिक को अलग से किसी राज्य की नागरिकता प्रदान नहीं करता है और न ही किसी अन्य देश की नागरिकता लेने की अनुमति देता है। अगर कोई नागरिक अपनी मर्जी से किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकर करता है तो उसकी भारत की नागरिकता स्वतः ही समाप्त हो जाती है।
यह व्यवस्था भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने के उद्देश्य से अपनाई गई। संविधान निर्माताओं का मानना था कि यदि राज्यों की अलग अलग नागरिकता होगी, तो क्षेत्रीय पहचान को अधिक महत्व मिल सकता है और राष्ट्रीय एकता पर नकारात्मक प्रभाव होगा। इसलिए पूरे देश के लिए एक समान नागरिकता की व्यवस्था की गई।
एकल नागरिकता के कारण देश के समस्त नागरिकों को समान अधिकार और समान अवसर प्राप्त होते है। वे भारत के किसी भी भाग के रह रहे हो। इससे राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलती है और नागरिकों के पूरे देश के प्रति समान भाव विकसित होता है।
राज्यपाल की नियुक्ति (Appointment of the Governor)
भारतीय संविधान की एक महत्वपूर्ण एकात्मक विशेषता राज्यपाल की नियुक्ति की व्यवस्था है। भारत के प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होता है, जो राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। संविधान के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति सीधे जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनाव से नहीं होती बल्कि राज्यपाल को राष्ट्रपति केंद्र सरकार की सलाह से नियुक्त करता है, इसलिए राज्यपाल की नियुक्ति में केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है और केंद्र तथा राज्य के बीच एक संवैधानिक कड़ी का कार्य निभाता है। राज्य की कार्यपालिका की शक्तियाँ राज्यपाल के नाम पर संचालित होती है, हालांकि वह सामान्यतः मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है। इसके बवाजूद कुछ परिस्थितियों में राज्यपाल को विवेकाधीन शक्तियाँ भी दी गई है।
राज्यपाल का एक महत्वपूर्ण दायित्व यह है कि वह राज्य की संवैधानिक व्यवस्था पर निगरानी रखे और यदि उसे लगे कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार कार्य नहीं कर रही है, तो वह इसकी जानकारी राष्ट्रपति को दे सकता है। इसी आधार पर राष्ट्पति शासन (अनुच्छेद 356) लगाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। इस कारण राज्यपाल की भूमिका केवल औपचारिक नहीं, बल्कि संवैधानिक दृष्टी से भी महत्वपूर्ण है।
आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)
भारत के संविधान की सबसे महत्वपूर्ण एकात्मक विशेषताओं में आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions) का विशेष स्थान है। सामान्य परिस्थितियों में भारत एक संघीय व्यवस्था के अनुसार कार्य करता है, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन होता है। किंतु किसी असाधारण या संकटपूर्ण स्थिति में संविधान केंद्र सरकार को अतिरिक्त शक्तियाँ प्रदान करता है, जिससे संपूर्ण शासन व्यवस्था अधिक एकात्मक स्वरूप धारण कर लेती है। यही कारण है कि अपातकालीन प्रावधानों को भारतीय संविधान के एकात्मक झुकाव का प्रमुख उदाहरण मान जाता है।
निष्कर्ष
भारतीय संविधान न तो पूर्णतः रूप से संघीय है और न ही पूर्णतः एकात्मक। यह दोनों व्यवस्थाओं का संतुलन मिश्रण है। सामान्य परिस्थितियों में भारत संघीय ढाँचे के अनुसार कार्य करता है, जबकि विशेष परिस्थितियों में केंद्र को अधिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाती है। यही कारण है कि भारतीय संविधान को "अर्ध-संघीय लेकिन एकात्मक झुकाव वाला संविधान" कहा जाता है।
भारतीय संघवाद की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लचीलापन (Flexibility) है, जो राष्ट्रीय एकता और क्षत्रिय स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करती है। यही संतुलन भारतीय लोकतंत्र को मजबूत और प्रभावी बनाता है।
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