क्या आपने कभी सोचा है कि भारतीय संविधान के प्रस्तावना के शुरुआती कुछ शब्द जैसे "संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणराज्य" का क्या मतलब है और ये भारत को किस प्रकार से परिभाषित करते है। प्रस्तावना में ये केवल कुछ शब्द नहीं बल्कि भारत के मूल आदर्शों और लोकतांत्रिक मूल्यों की पहचान है। ये शब्द भारत की प्रकृति को दर्शाते है कि भारत किस प्रकार का देश है। "संप्रभु" शब्द का अर्थ है कि भारत किसी भी बाहरी शक्ति के अधीन नहीं है और भारत अपने आंतरिक और बाहरी मामलों के संबंध में निर्णय ले सकता है। "समाजवादी" यह शब्द भारत की सामाजिक और आर्थिक समानता का दर्शाता है, जबकि "पंथनिरपेक्ष" से अभिप्राय है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करेगा, और "लोकतांत्रिक" शब्द यह बताता है कि भारत की सरकार जनता अर्थात् भारत के नागरिकों द्वारा चुनी जाएगी और अंत में "गणराज्य" से मतलब है कि राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत नहीं बल्कि निर्वाचित होगा।
भारत का "संप्रभु" राज्य होना
संविधान की प्रस्तावना में भारत को सबसे पहले एक संप्रभु राज्य के रूप में परिभाषित किया गया है। संप्रभु का अर्थ है कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने सभी आंतरिक और बाहरी मामलों के संबंध में सभी निर्णय पूर्ण रूप से स्वतंत्र होकर अपने अनुसार लेने की क्षमता रखता है। भारत अपने लिए कानून, नीतियाँ और बाकी निर्णय अपने विवेक अनुसार लेता है।
संप्रभुता दो प्रकार की होती है: जैसे आंतरिक संप्रभुता और बाहरी संप्रभुता। आंतरिक संप्रभुता का मतलब है कि देश के भीतर अंतिम शक्ति भारतीय राज्य और संविधान के पास होती है। भारत के कानून बनाने, शासन चलाने और न्याय देने का अधिकार भारतीय संस्थाओं के पास है, जबकि बाहरी संप्रभुता का अर्थ है कि भारत किसी विदेशी राष्ट्र के अधीन नहीं है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता है।
1947 के भारत के आजाद होने के साथ ही भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई। भारत किसी भी देश का उपनिवेश या आश्रित राष्ट्र नहीं है। इसी कारण भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक नीतियों और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर स्वयं निर्णय लेता है।
भारत एक संप्रभु राष्ट्र है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण है कि "भारत की परमाणु नीति" भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र परमाणु नीति बनाई और आवश्यकता अनुसार परमाणु परीक्षण भी किये। इसके अलावा भारत संयुक्त राष्ट्रीय जैसे संगठनों के भी स्वतंत्र और प्रभावशाली भूमिका निभाता है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के भारत की महत्वपूर्ण और सक्रिय भागीदारी भी भारत के संप्रभु होने का एक प्रमाण है।
इस प्रकार "संप्रभु" शब्द भारत की स्वतंत्र पहचान, आत्मनिर्णयन की क्षमता और वैश्विक स्तर पर उसकी पहचान को प्रकट करता है।
भारत की समाजवादी प्रकृति
समाजवादी शब्द मूल संविधान की प्रस्तावना में नहीं था। इसे 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में शामिल किया गया, किंतु समाजवादी होने के प्रमुख गुण मिल संविधान के अलग-अलग भाग और अनुच्छेद के प्रारंभ से ही मौजूद थे। समाजवादी प्रकृति का उद्देश्य भारतीय राज्य की सामाजिक न्याय और कल्याणकारी नीति के प्रति प्रतिबद्धता को निर्देशित करता है।
समाजवाद राज्य का अर्थ ऐसी व्यवस्था से है जिसमें समाज के सभी लोगों को समान अवसर मिलें और आर्थिक असमानता को खत्म किया जा सके। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि समाज के सबसे कमज़ोर और पिछड़े वर्ग को भी अपने विकास और उत्थान करने के लिए संसाधनों के प्रयाप्त पहुंच सुनिश्चित हो सके। भारत का समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद पर आधारित हैं, जहाँ लोकतंत्र के साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय को भी महत्व दिया हुआ है।
यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारत का समाजवाद "लोकतांत्रिक समाजवाद" है न कि "साम्यवादी समाजवाद" जिसे राज्यमिश्रित समाजवाद भी कहते है। जिसमें उत्पादन और वितरण के सभी साधनों का राष्ट्रीयकरण और निजी संपत्ति का उन्मूलन शामिल है। लोकतांत्रिक समाजवाद मिश्रित अर्थव्यवस्था के आस्था रखता है, जहां सार्वजनिक व निजी क्षेत्र साथ साथ मौजूद रहते है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहां है "लोकतांत्रिक समाजवाद का उद्देश्य गरीबी, उपेक्षा, बीमारी और अवसर की असमानता को समाप्त करना है।" भारत का समाजवाद मार्क्सवाद और गांधीवाद का मिला जुला रूप है, जिसमें गांधीवादी समाजवाद की ओर अधिक झुकाव है।
भारत में आर्थिक असमानता को दूर करने लिए लिए केंद्र और राज्य सरकार समय समय पर कई योजनाएँ और नीतियाँ लागू करती है। जिसके तहत गरीबी हटाने, बेरोजगारी कम करने, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को अधिक प्रभावी रूप से लागू करने और ग्रामीण लोगों तक पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है।
संविधान के राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP) समाजवादी विचारधारा को मजबूत आधार प्रदान करता है। ये सरकार को ऐसी नीति बनाने के लिए प्रेरित करते है जिससे सामाजिक और आर्थिक न्याय सभी तक पहुंच सके। गरीबों, मजदूरों, किसानों और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करना भी इसी अवधारणा का हिस्सा है।
राज्य द्वारा आरक्षण व्यवस्था भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के मध्य सामजिक समानता स्थापित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसी के साथ "मनरेगा" ( वर्तमान नाम VB-G RAM G) भी आर्थिक समानता को कम करने का एक प्रयास है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मुफ़्त शिक्षा, स्वास्थ योजनाएँ और विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाएँ भी समाजवादी राज्य की भावना को दर्शाती है।
"पंथनिरपेक्ष" का अर्थ
समाजवादी शब्द की तरह ही पंथनिरपेक्ष शब्द भी मूल संविधान की प्रस्तावना में शामिल नहीं था। इसे 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 में प्रस्तावना के शामिल किया गया था। किंतु पंथनिरपेक्ष शब्द प्रस्तावना में शामिल नहीं होने के बावजूद भी पंथनिरपेक्षता के तत्व संविधान के अनुच्छेद 25 से अनुच्छेद 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित अधिकारों के प्रावधानों के मौजूद थे।
संविधान के भारत को एक "पंथनिरपेक्ष" (Secular) राज्य कहा गया है। पंथनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का किसी एक धर्म विशेष से कोई आधिकारिक संबंध नहीं होगा और राज्य सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान तथा निष्पक्ष व्यवहार करता है। भारत न तो किसी धर्म को राज्य धर्म घोषित करता है और न ही किसी नागरिक के साथ उसके धर्म के आधार पर भेदभाव करता है।
संविधान निर्माताओं का पंथनिरपेक्षता अपनाने का मूल उद्देश्य देश के प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार जीवन जीने की आज़ादी देना है। भारत में अनेक धर्मों और संस्कृतियों के लोग रहते है, पंथनिरपेक्षता के माध्यम से इनके मध्य राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव और धार्मिक सहिष्णुता को मजबूत बनाना है।
संविधान के अनुच्छेद 25 से अनुच्छे 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित अधिकारों का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं अनुच्छेद धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन, धार्मिक शिक्षा तथा धार्मिक करों से संबंधित प्रावधानों को स्पष्ट करते है।
भारत को "लोकतांत्रिक" क्यों कहा गया?
संविधान की प्रस्तावना में वर्णित शब्द लोकतांत्रिक भारत के होने का प्रतीक है। लोकतंत्र का अर्थ है एक ऐसी शासन व्यवस्था से है जिसमें सर्वोच्च शक्ति जनता के हाथों में निहित होती है और जनता ही अपनी सरकार को चुनती है। भारत के नागरिक अपने प्रतिनिधियों को चुनाव करके सरकार का निर्माण करती है, इसलिए भारत को लोकतांत्रिक राष्ट्र कहा जाता है।
लोकतंत्र दो प्रकार का होता है: प्रत्यक्ष लोकतंत्र और अप्रत्यक्ष लोकतंत्र। प्रत्यक्ष लोकतंत्र में लोग अपनी शक्ति का इस्तेमाल प्रत्यक्ष रूप से करते है जैसे कि स्विजरलैंड में किया जाता है। प्रत्यक्ष लोकतंत्र के चार मुख्य स्तंभ होते हैं परिपृच्छा (Referendum), पहल (Initiative), प्रत्यावर्तन या प्रत्याशी को वापस बुलाना (Recall) तथा जनमत संग्रह (Plebiscite)। वहीं दूसरी और अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि सर्वोच्च शक्ति का इस्तेमाल करते है और सरकार चलते हुए कानूनों का निर्माण करते है। यह दो प्रकार का होता है संसदीय और राष्ट्रपति के अधीन।
भारत के लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें सार्वभौमिक मताधिकार का प्रावधान शामिल है मतलब प्रत्येक व्यक्ति जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो और वह भारत का नागरिक हो, तो बिना किसी धर्म, जाति, लिंग, भाषा, संपत्ति या शिक्षा के भेदभाव के, मतदान करने का अधिकार रखता है। यह व्यवस्था सभी नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने के समान अवसर देती है।
लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार राजनीतिक समानता है। भारत के प्रत्येक मतदाता का वोट समान मूल्य रखता है। चाहे कोई व्यक्ति अमीर हो या गरीब, उसका मतदाता अधिकार समान होता है। यही राजनीतिक समानता लोकतंत्र की वास्तविक भावना को दिखाती है।
संसद भारत के लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का प्रमुख संस्थान है। संसद जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से मिलकर बनती है और देश के लिए कानून बनाने का कार्य करती है। इसके माध्यम से जनता की इच्छाएं और अपेक्षाएँ शासन तक पहुँचती है। इसके अलावा, भारतीय लोकतंत्र नागरिकों के अनेक अधिकार प्रदान करता है, जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने का अधिकार और सरकार की आलोचना करने का अधिकार। ये नागरिक अधिकार लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं और शासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाते है।
"गणराज्य" का अर्थ?
प्रस्तावना में भारत को केवल लोकतांत्रिक ही नहीं बल्कि "गणराज्य" भी कहा है। गणराज्य का अर्थ है कि राष्ट्रध्यक्ष का पद किसी वंश या परिवार के आधार पर नहीं, बल्कि जनता द्वारा एक निश्चित समय के लिए चुना जाएगा। भारत के राष्ट्रध्यक्ष यानी राष्ट्रपति का चयन लोकतांत्रिक तरीके से किया जाएगा, इसलिए भारत एक गणराज्य देश है।
भारत के राष्ट्रपति जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं चुने जाते, बल्कि एक निर्वाचन मंडल (Electoral College) द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है। इस निर्वाचन मंडल के संसद के निर्वाचित सदस्य और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य शामिल होते है। इसी तरह राष्ट्रपति का पद जनता की संप्रभुता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते है।
गणराज्य की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि इसमें वंशानुगत शासन नहीं होता। किसी व्यक्ति को केवल किसी शाही परिवार या परिवार विशेष के जन्म लेने के कारण मात्र से राष्ट्रध्यक्ष बनने का अधिकार नहीं मिलता। देश का कोई भी नागरिक, निर्धारित संवैधानिक शर्तों को पूरा करके राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बन सकता है। यह व्यवस्था सम अवसर और लोकतंत्र के मूल्यों को मजबूत बनाती है।
गणराज्य के अर्थ में दो और बातें शामिल है। पहली यह कि राजनीतिक संप्रभुता किसी एक व्यक्ति जैसे राजा के हाथ में होने की बजाए लोगों के हाथ में होती है और दूसरी बात यह कि किसी भी विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की अनुपस्थिति। इसलिए हर सार्वजनिक कार्यालय बगैर किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक के लिए खुला रहेगा।
निष्कर्ष
प्रस्तावना में शामिल ये पाँच शब्द संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य केवल शब्द नहीं है, बल्कि भारतीय राष्ट्र की पहचान और संवैधानिक दर्शन का सार हैं। ये शब्द उन आदर्शों को व्यक्त करते है जिनके आधार पर भारत का शासन, समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था संचालित होती है। संप्रभुता भारत की स्वतंत्रता और आत्मनिर्णयन की शक्ति को दिखाता है, समाजवादी शब्द सामाजिक और आर्थिक न्याय की भावना को मजबूती प्रदान करता है, पंथनिरपेक्षता सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान सुनिश्चित करती है, लोकतंत्र जनता को शासन की वास्तविक शक्ति प्रदान करता है और गणराज्य की अवधारणा समान अवसर और जनसत्ता को स्थापित करती है।
ये सभी सिद्धांत मिलकर भारत को एक समावेशी, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाते है। आज भी संविधान के ये सिद्धांत और आदर्श देश के विकास और राष्ट्रीय एकता के मार्गदर्शक बने हुए हैं। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह इन संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करे और उन्हें जीवन में अपनाकर एक मजबूत एवं जागरूक लोकतंत्र के निर्माण में योगदान दे। यही संविधान निर्माताओं की भावना और भारतीय गणराज्य की वास्तविक शक्ति है।
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